Friday, 13 April 2012

मैं जहां भी जाता हूं

मैं जहां भी जाता हूं

मैं जहां भी जाता हूं अपने धड पर सिर लदा रख़ता हूं
यह मुझे बचाता है हहाकारों से
और अंधेरे में उतरने से सचेत करता रहता है हमेशा

यह मुझे एक चमचमाती हुई दिशा दिखाता है
और दौडाता रहता है उसी तरफ
यह मुझे ले जाता है आसमान में
और अंगुली पकडकर स्पर्श कराता है चांद का

लेकिन जब मैं अपनी प्रेमिका से मिलने घर से निकलता हूं
सिर धड से गायब हो जाता है
और तब मैं ब्रह्मांड का स्पंदन फिर से महसूस करने लगता हूं
तब मुझे फूलों की संख्या नगण्य नज़र आने लगती है पृथ्वी पर
और लगता है कि कोयल न कूकने का अभ्यास करने लगी है आजकल
और कबूतर न जाने कहां भागे जा रहे हैं

मेरी प्रेमिका रोती हुई मिलती हैं मुझसे
और मैं हारा सा उसकी गोद में लेट जाता हूं